Tuesday, 25 March 2014

हेरनाई प्रने भिदेयो मेरो शाथी हरु प्रदेश को जिबन ।


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Lamahi dang





Lamahi dang


ॐ जय माता,मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निशि दिन सेवत,सरि बिष्णु विधाता ।। ॐ
उमा रमा,ब्रहाणी तुमहि जग माता।
सुर्य- चंद्रमा ध्यावत,नारद ऋषि गाता ।। ॐ

दुर्गा रुप निरंजनि,सुख-सम्पति दाता।
जो कोहि तुमको ध्याता,ऋध्दि-सिध्दि धन पाता ।।ओ३म्।।

तुम पाताल-निवासिनि,तुम शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी,भवनिधि कि त्राता।। ओ३म्।।

जिस घरमे तुम रहति।सब सदगुण आता।
 सब सम्भव हो जाता,मन नहीं घबराता।। ओ३म्।।

तुम बिना यज्ञ नहि होता, वस्त्र न होता पाता।
खान-पान का वैभव,सब तुमसे आता।। ओ३म्।।

शुभ-गुण मंदिर सुन्दर, क्षीरो दधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिना कोइ नहि पाता ।। ओ३म्।।

महालक्ष्मीजि की आरति,जो कोहि जन गाता।
उर आन्नद समाता।पाप उतर जाता।। ओ३म्।।

Lamahi dang

प्रेम तो समर्पण है मालकियत नहीं !

प्रेम में ईष्या हो तो प्रेम ही नहीं है; फिर प्रेम के नाम से कुछ और ही रोग चल रहा है। ईष्या सूचक है प्रेम के अभाव की। यह तो ऐसा ही हुआ, जैसा दीया जले और अंधेरा हो। दीया
जले तो अंधेरा होना नहीं चाहिए। अंधेरा का न हो जाना ही दीए के जलने का प्रमाण है।र् ईष्या का मिट जाना ही प्रेम का प्रमाण है। ईष्या अंधेरा है; प्रेम प्रकाश जैसा है। इसको कसौटी समझना। जब तकर् ईष्या रहे तब तक समझना कि प्रेम प्रेम नहीं। तब तक प्रेम के नाम से कोई और ही खेल चल रहा है; अहंकार कोई नई यात्रा कर रहा है- प्रेम के नाम से दूसरे पर मालकियत करने का मजा, प्रेम के नाम से दूसरे का शोषण, दूसरे व्यक्ति का साधन की भांति उपयोग। और दूसरे व्यक्ति का साधन की भाँति उपयोग जगत में सबसे बड़ी अनीति है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति साध्य है, साधन नहीं।
तो भूल कर भी किसी का उपयोग मत करना। किसी के काम आ सको तो ठीक, लेकिन किसी को अपने काम में मत ले आना। इससे बड़ा कोई अपमान नहीं है कि तुम किसी को अपने काम में ले आओ। इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा को सेवक बना लिया। सेवक बन सको तो बन जाना, लेकिन सेवक बनाना मत। असली प्रेम उसी दिन उदय होता है जिस दिन
तुम इस सत्य को समझ पाते हो कि सब तरफ परमात्मा विराजमान है। तब सेवा के अतिरिक्त कुछ बचता नहीं। प्रेम तो सेवाहै,र् ईष्या नहीं। प्रेम तो समर्पण है, मालकियत नहीं।
किसिने मुझे पूछा है- प्रेम मेंर् ईष्या क्यों है? लेकिन प्रश्न पूछने वाले की तकलीफ मैं समझ सकता हूँ। सौ में निन्यानवे मौके पर जिस प्रेम को हम जानते हैं वह ईर्षया का ही दूसरा नाम है। हम बड़े कुशल हैं। हम गंदगी को सुगंध छिड़ककर भुला देने में बड़े निपुण हैं। हम घावों के ऊपर फूल रख देने में बड़े सिध्द हैं। हम झूठ को सच बना देने में बड़े कलाकार हैं। तो होती तोर् ईष्या ही है, उसे हम कहते प्रेम हैं। ऐसे प्रेम के नाम सेर् ईष्या चलती है। होती तो घृणा ही है, कहते हम प्रेम हैं। होता कुछ और ही है। एक देवी ने और प्रश्न पूछा है। पूछा है कि 'मैं सूफी ध्यान नहीं कर पाती और न मैं अपने पति को सूफी ध्यान करने दे रही हूँ। क्योंकि सूफी ध्यान में दूसरे व्यक्तियों की ऑंखों में ऑंखें डाल कर देखना होता है। वहाँ स्त्रियाँ भी हैं। और पति अगर किसी स्त्री की ऑंख में ऑंख डाल कर देखे और कुछ से कुछ हो जाए तो मेरा क्या होगा? और वैसे भी पति से मेरी यादा बनती नहीं है।' जिससे नहीं बनती है उसके साथ भी हम प्रेम बतलाए जाते हैं। जिसको कभी चाहा नहीं है उसके साथ भी हम प्रेम बतलाए चले जाते हैं। प्रेम हमारी कुछ और ही
व्यवस्था है - सुरक्षा, आर्थिक, जीवन की सुविधा। कहीं पति छूट जाए तो घबराहट है। पति को पकड़ कर मकान मिल गया होगा, धन मिल गया होगा- जीवन को एक ढाँचा मिल गया
है। इसी ढाँचे से अगर तुम तृप्त हो तो तुम्हारी मर्जी। इसी ढाँचे के कारण तुम परमात्मा को चूक रहे हो, क्योंकि परमात्मा प्रेम से मिलता है। प्रेम के अतिरिक्त परमात्मा के मिलने का
और कोई द्वार नहीं है। जो प्रेम से चूका वह परमात्मा से भी चूक जाएगा। भय और प्रेम साथ-साथ हो कैसे सकते हैं? इतना भय कि पति कहीं किसी स्त्री की ऑंख में न ऑंख डाल कर
देख लें! तो फिर प्रेम घटा ही नहीं है। फिर तुम्हारी ऑंख में ऑंख डालकर पति ने नहीं देखा और न तुमने पति की ऑंख में ऑंख डालकर देखा है। न तुम्हें पति में परमात्मा दिखाई
पड़ा है, न पति को तुममें परमात्मा दिखाई पड़ा है। तो यह जो संबंध है, इसको प्रेम का संबंध कहोगे?
अगर प्रेम घटे तो भय विसर्जित हो जाता है। तब पति सारी दुनिय की स्त्रियों की ऑंख में ऑंख डाल कर देखता रहे तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। हर स्त्री की ऑंख में तुम्हीं को पा
लेगा। हर स्त्री की ऑंख में तुम्हारी ही ऑंख मिल जाएगी, क्योंकि हर स्त्री तुम्हारी ही प्रतिबिंब हो जाएगी। हर स्त्री को देख कर तुम्हारी ही याद आ जाएगी। लेकिन प्रेम तो घटता नहीं;
किसी तरह संभाले है अपने को। ऐसे ही तुम्हारे सब प्रेम के संबंध हैं। एक-दूसरे पर पहरा है। एक-दूसरे के साथ दुश्मनी है, प्रेम कहाँ! प्रेम में पहरा कहाँ? प्रेम में भरोसा होता है।
प्रेम में एक आस्था होती है। प्रेम में एक अपूर्व श्रध्दा होती है। ये सब प्रेम के ही फूल हैं - श्रध्दा, भरोसा, विश्वास। प्रेमी अगर विश्वास न कर सके, श्रध्दा न कर सके, भरोसा न कर
सके, तो प्रेम में फूल खिले ही नहीं।र् ईष्या, जलन, वैमनस्य, द्वेष, मत्सर तो घृणा के फूल हैं। तो फूल तो तुम घृणा के लिए हो और सोचते हो प्रेम का पौधा लगाया है। नीम के कड़वे
फल लगते हैं तुममें और सोचते हो आम का पौधा लगाया है। इस भ्रांति को तोड़ो। इसलिए जब मैं तुमसे कहता हूँ कि प्रेम सत्य तक जाने का मार्ग बन सकता है तो तुम मेरी बात को
सुन तो लेते हो लेकिन भरोसा नहीं आता। क्योंकि तुम प्रेम को भलीभांति जानते हौ। उसी प्रेम के कारण तुम्हारा जीवन नरक में पड़ा है। अगर मैं इसी प्रेम की बात कर रहा हूँ तो
निश्चित ही मैं गलत बात कर रहा हूँ। मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूँ- उस प्रेम की, जिसकी तुम तलाश कर रहे हो, लेकिन जो तम्हें अभी तक मिला नहीं है। मिल सकता है,
तुम्हारी संभावना है।
और जब तक न मिलेगा तब तक तुम रोओगे, तड़पोगे, परेशान होओगे। जब तक तुम्हारे जीवन का फूल न खिले और जीवन के फूल में प्रेम की सुगंध न उठे, तब तक तुम बेचैन
रहोगे। अतृप्त! तब तक तुम कुछ भी करो, तुम्हें राहत न आएगी, चैन न आएगा। खिले बिना आप्तकाम न हो सकोगे। प्रेम तो फूल है।.


Lamahi dang

कहानि जीबन कि।(अधुरो प्रेम)


जिन्दगि को हरेक पलका तितामिठा क्षणको स्वाद लिदै उकालि ओरालि लाई साथि बनाउदै एउटा मुकाम सम्म यो जिन्दगिले पाइला चालिरहेको छ,,जिन्दगिमा एक सुन्दर सपना बोकेर पाइला चाल्दा चाल्दै होसियारिलाइ अगाडि बढाइ आफ्नो लक्ष्य निर्धारित गर्ने होडबाजिमा पनि किन हो किन एक अनयासै रोकावट को सामना गर्नु पर्दो रैछ,यस्तै दु:ख पिडा सँग जुध्दा जुध्दै पनि जिन्दगिमा नसोचेको हुदोरैछ अनि मनको आशा टुटेर जान केहि बेर पनि लाग्दो रैनछ, यस्तै क्रमको यो सानो मेरो जिबनको घटना तपाइ सामु पोखन गइरहेको छु ,,
हुन त यो मेरो घटना पुरानि त होइन यहि 2 साल पहिलेको हो बस 2 साल पहिलेको,,जुन टाइममा म कलेज अध्यनरत थिए जहाँ हामि दाजु भाइ सँग बस्थेउ एक दिनको कुरा हो साथिहरु बिहान सबेरै उठेर नुहाधुहाइ सकेर दाजु भाइ मिलि भगवानको दर्शन गर्न गुयौ,बिन्धबासिनि माइ को मन्दिर हामि बसेको ठाऊ बाट धैरै टाढा छैन,मन्दिर पुगि भगबानको दर्शन गरियो,,अनि भगबानको टिका र आशिर्वाद लिएर,,हामि रुममा फर्कियौ,अनि म चिया नास्ता बनाउन तिर लागे,नास्ता तयार गर्ने क्रममा मेरो निधार बाट अचानक एकाएक अक्षता खस्नपुग्छ । अचानक यसो हुदा म झसङ्ग झस्किए,अलालिए, मनमनै डराइरहे, आज भन्दा पहिला त यस्तो भा थिएन एक्कासि यो के भयो भन्ने सोच्दै रहे मनमा एक प्रकार को खुलदुलिले सताइरहयो, म डराइरहेको थिए,आज मेरो जीवनमा केहि हुनेछ ,कहि नराम्रो केहि हुने त होइन भन्नि सोच्दै अनेक कुरा मनमा खेलाउदै समयलाइ बिताइरहेको थिए।यत्तिकैमा दाइले मलाइ चिया नास्ता गर्ने भन्नु भयो हामि दुइ मेलेर नास्ता लियौ अनि आफ्नो पढाइलाइ अघाडि बढायौ ,किन किन मलाइ बिहानिको त्यो घटनाले केहि गर्ने मन लागिरहेको थिएन। हुनत हामि आज खुशि थियौ एक महिना पछि घर जादै थियौ, तर बिहानको घटनाले तितो महसुस भैरहेको थियो,मन डुलिरहेको थियो स्थिर थिएन।मनलाइ जति समाल्ने कोसिस गरेपनि कता कता मनमा काडाँ बिजे जस्तो भान भैराको थियो।
दु:ख पिर त यो जिन्दगिका साथि थिए तर पनि यो बेदना भन्दा त्यो अनयासै घटेको घटनाले पिरोलिरहेको थियो। आज किनकिन खुशि भन्नि चिज म बाट लुटिएको हो कि जस्तो लागिरहेछ, यस्तै यस्तै नरमाइला मनका बेदना मन भरि बनाउदै दिन बितेको थाहा नै भएन, आज म कलेज पनि गइन,मेरो दाइ कलेज बाट आउनु भयो, अनि उहा घर जाने तुयारिमा लाग्नु भयो।। एक छिन पछि हामि दुइ रुम बाट निक्लियौ,अनि बस स्टेण्ड तिर लागियो,,बस टेसनमा पुगेपछि बसमा चढ्यौ एक छिन पछि बसले आफ्नो गति लियो,,म एक धुनमै बिलिन भइसहेको थिए,,एक्कासि बसले ब स्टपमा लगेर ब्रेक लगाउदा पो म झस्किन पुगे,मलाइ सपना जस्तै लागि रहेको थियो । बाटो कति खेर काटिएछ थाहै भएन,दाजुले चल भनेपछि पो म झसन्ग भए म आफु आफु मै सरमाउन पुगे होइन के भा छ मलाइ आज भनेर । बसबाट उत्रिए पछि मेरो गाउ जान 1 घन्टाको पैदल यात्रा गर्नुपर्छ हामी एकछिन चिया नास्ता गर्न होटेल मा पस्यौ 5,10 मिनेट पछि घर को बाटो लागियो,,बाटोमा घरि घरि दाजुभाइमा कुरा हुन्थ्यो नत्र म मेरो सुरमै हुन्थे,उहि कुराले छटपटाइरहेको थियो। ...................

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""पानि र काँचको खेल पनि अचम्मको छ,कुन बाहिर किन भित्र थाहै नहुने।।""
शक्कल हेरेर चरित्र, थाहै नहुने।
कुन दुश्मन कुन मित्र थाहै नहुने।।

पानि र काँचको खेल पनि अचम्मको छ,
कुन बाहिर किन भित्र थाहै नहुने।।

दशा लाग्दा किताबको बाघले झम्टिदो रैछ,
किन साँच्चिको,कुन चित्र थाहै नहुने।

नरकको द्वार हुँदै बगिदिँदा गङ्गा,
कुन जुठो ,कुन पवित्र थाहै नहुने।।

सेकेण्डै पिच्छे घटिरहने छ घटना,
कुन सामान्य,कुन बिचित्र थाहै नहुने।।

Lamahi dang

""पुरानो घाउमा नलगाउ मलाम,.दुख्छ,बल्झिन्छ,रुन्छ मन फेरि।।""
जे हुनुथ्यो भयो अब,
अतित लाई नबल्झाउ फेरि।।
पुरानो घाउमा नलगाउ मलाम,
दुख्छ,बल्झिन्छ,रुन्छ मन फेरि।।

सम्झि ल्याउदा बेहोसिझै,
मन डुल्छ यता उता,
मन को बह पोखनु थियो,,
होइन म जाउ आज कता,

धोका दियो,जिबनले,
पर्नु पिर परेको छ।
ज्यानको दु:ख पखाल्न लाई,
एसिड लिनुपरेको छ।

लेखि दियो भाबिले नै,
बदलु कसरि यो रुपरेखा फेरि,
जिन्दगिको कालो बादल,
उड्नि भो यसरिनै फेरि ।।।

Lamahi dang

"""""""""""""""" के भयो यस्तो """"""""""""""""""
बाचा कसम मैले होइन उनले धेरै भुलेकै हुन,,
उ बेलामा,,उनले पनि I love u dear भनेकै हुन।
प्यारको चिनो दिदा खेरि,मेरो काले, भनेकै हुन,
मेरो जुठो खाएरनै माया पिरति लाएकै हुन।
प्यारको पोको खोल्दा खेरि भो दूख्छ घाउ भनेकै हुन,,
म रोएको देख्दा खेरि आँशु उनले झारेकै हुन।

के गर्ननै सक्छु आज,आँशु पिइ बस्नु बाहेक,
आफ्नो भन्नु छैन कोहि,,लास्ट मा उनले बिदा भनेकै हुन।
आखिर पाए मैले आज उनकै प्यारको पागलपन,
आफ्नै मैले सोच्ने गर्थे,,पराइ उनले सोचेकै हुन।
के भयो भयो आज मलाइ,एक्लो पन ले छाइसक्यो,
उनकै प्यारको प्यासले आज आधि ज्यान भइसक्यो ।

Lamahi dang

""सोचेकै थे आफ्नै भनि धोका तिमले दियौ किन,"""झुटो कसम ब्यर्थै पिलाइ नाता तिमले तोड्यौ किन।।""
सोचेकै थे आफ्नै भनि धोका तिमले दियौ किन,
गल्ति थियो मेरै आखिर बाँचा कसम भुल्यौ किन।।
सँगै बाच्ने सँगै मर्ने कसम आज कसिङ्गर भयो किन,
झुटो कसम ब्यर्थै पिलाइ माया मारि गयौ किन।।

आफ्नै भनि सोचेकैथे तिमले अर्कै सोच्यौ किन,
आफ्नो भन्नु पर्दैन भो नाता तोड्यौ तिमले किन।।
के गल्ति भो मेरो आज तिमले पराइ सोच्यौ किन,
नसोचेको नसम्झेको हुन गयो आज किन ।।

सँगै जिउने कसम आज झुटो साबित भयो किन,
दिएकै थे चोखो माया लत्याएर गयौ किन।।
संसारकै प्यारो सोच्थे देखाबटि गर्यौ किन ,
पर्दैन भो आफ्नो भन्न भनि गयौ तिमले किन।।

मर्नु बाँच्नु बनाइ छाड्यौ खेल हो,दुई दिनको सम्यौ किन,
मुटु मेरो जल्छ सधै कमजोरिमा फसे किन ।।
प्यारको खेललाई सम्झौ तिमले मनोरञ्जन आज किन,
झुटो कसम ब्यर्थै पिलाइ नाता तिमले तोड्यौ किन।।

Lamahi dang

""के के हुन्छ जिन्दगिमा""
के के हुन्छ जिन्दगिमा,
पराई पनि आफ्नै हुने ।
नसोचेको नचिताएको,
काम पनि आफै हुने ।

भाग्य पनि कस्तो रैछ,
आफ्नो ज्यान सुकाएर ।
अरुको सेबा गर्नुपर्ने
आधि पेटको खाना खाइले,
पुरै पेट भर्नु पर्ने ।।

यो जुनि धोका पाए,
दु:ख पिर को सँग पोखु,
सकिएन एक्लै बस्न,
आको आँशु कसरी रोकु ।।
......कसरी रोकु.....

Lamahi dang

प्रेम

"डाँडा होइन म घाम्लाई छेकिदिने
कान्डा होइने म पैतला म बिझिदिने
म त प्रेम को सुन्दर फुल बारी को गुलाब हु
चारै तिर प्रेम को सुगन्ध फैलाई दिने"





मुटुको घाउ चर्किरहेछ औषधी एकजात छैन
दुःख आईपरेको छ मायालुको साथ छैन
अब त संसारै बिरानो लागी सक्यो मलाई
बलिन्द्रधारा आंशु बगेको छ पुछीदिने हात छैन ॥

Lamahi dang

गरीब को पारीभाषा दिन नखोज् मलाई

एक खुल्ला कापिको पाना हुँ म
आधा लेखिएको आधा च्यातिएको
अधुरो कहानि हुँ म !
बिचैमा लेख्न्न छाडिएको
समुन्द्रबिचको यात्रि हुँ म
बाटो बिराई रुमलिएको !
मरुभुमि बिचको यात्रि हुँ
मतिर्खाले छपटिरहेको
एक उदाष पुरुष हुँ म!
निराष भै टोलाई रहेको
कसैले धोका दिएको पुरुष हुँ म
नारि देखि तर्सिएको !
गरीब को पारीभाषा दिन नखोज् मलाई
किनकी म गरीब पारीवार् हुर्केको मान्छे हु ।
प्रेम् को बयान् गर्न नखोज् मसँग किनकी
म प्रेम् मा धोका खाएर बचेँको मान्छे हु ।
शहरको महिमा न सुनाउ मलाई किनकी
म गाउको शान्त बातावरणमा जन्मिएको मान्छे हु ।
सुखको सपना देखाउन नखोज् मलाई किनकी
म दु:ख् मा जिउन जानी सकेको मान्छे हु ।"

नोटः जिन्दगी का पलहरु  ब्लगबाट सभार गरिएको

Lamahi dang

म अनी मेरो सुन्यता


समाज सग अयोग्य भै ठोकिन पुगे I

रिसको आवेगमा आँफै सग झोकिन्न पुगे II

जिबन जिउनु को औचित्य नै रहेन I

आफू आफू सगै एक्नास सग ठोक्किन पुगे II

मन भरी का चाहना अभिलाषा सगै I

होड बाजी मा अघी सर्ने म आँफै पहिला रोकिन पुगे II

मुग्लानिएर जवानी दासता मा ब्यतित हुँदा I

समय को पावन्दी मा आफ्फै ठोकिन पुगे II

Lamahi dang

।।माता पिता।।
""सर्व तीर्थ मयी माता,सर्व देव मय: पिता ।
मातरं पितरं तस्मात्सर्व यत्नेन पूजयेत् ।।""


संसार यस्तो ठाउँ हो जहा असं‍भव भन्नि केहि चिज हुदैन तर मलाइ लाग्छ त्यो दुनियामा केहि चिज छ जो किनेर नि नपाइने ,मागेर नि नपाइने ,, यि चिज प्रमुख त प्यारा "माता पिता" अनि "समय"
 माता पिता भनेका हाम्रा ईश्वर हुन् ,अन्नदाता हुन्। उनको नजरमा सबै बराबरि हुन्छन कोहि काखा तो कोहिलाइ पाखा भन्नि चिज माता पिता को शब्दकोस मानै नहोला । माता पिता लाई जस्तो सुकै दु:ख परेपनि हेला गर्नु हुदैन,,हाम्रो समाजले बुढाबुढि भएपछि हेला गर्ने,,नराम्रो ब्यबहार गर्ने,भोकमा खान नदिने,बिरामि पर्दा घिन मान्ने  गरेको कयौ घटना म देख्दै आएको छु । मलाइ लाग्छ यो सरासर गलत हो ,हाम्रा इश्वर समान माता पिता को सेबा गरेमा नत धर्मको लागि मन्दिरै जानु पर्छ नत तिर्थ घरमै हुनुहुन्छ भगबान उहाँहरुलाइ सेबा गरे,पुजे, नराम्रो नबोले, राम्रो सँग रेखदेख गरे भगबान आफै खुशि हुनुहुनेछ ।। अनि बरदान दिनुहुनेछ।।।
दुर्ब्यबहार,बचन,हेला यि ईश्बरका मन नपर्ने चिज हुन यसलाइ जिबन बाट टाढै धकेलौ ।।बस भगबान खुशि हुनेछन अबश्य ।। घरका ईश्बर चिनौ सबैले ।।बस


सर्व तीर्थ मयी माता,सर्व देव मय: पिता ।
मातरं पितरं तस्मात्सर्व यत्नेन पूजयेत् ।।

Lamahi dang

"प्रदेशमा भएनी"

नेपाली हामी नेपाली'भै नसोचौ
पराई जो जहाँ रहेनी।
नेपालको माया औधी छ हामीलाई
प्रदेशमा भएनी।
प्रदेशमा बसी फूलेका सृजना
नेपालमा लगी सारौला।
जन्मेको भुमी भुलेका कहाँ छौ
धर्ति माता लाई सिङ्गार्न पुगौला।
उघारी हेर मनको पर्दा नेपालको
माया सबैको मुटुमा छ।
फुलाउन सके विश्वाश सबैमा नेपाल
हाम्रो स्वर्गनै बन्द छ।

Lamahi dang

।। गुरुमहिमा।।

गुरुब्रम्हा गुरुबिष्णु: गुरुदेबो महेश्चर:।
गर: साक्षात् परंब्रम्हा तस्मै श्रीगुरवे नम:।।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शित येन तस्मै श्रीगुरवे नम:।।
ध्यानमुलं गुरो:मूर्ति: पुजामुलं गुरो: पदम्।
मन्त्रमुलं गुरोवाक्यं,मौक्षमुलं गुरो: कृपा।।

Lamahi dang

"परदेशि जिवन"
(परदेशि)

       कोहि दिन सोच्ने गर्थे परदेश भन्नि कस्तो होला,के त्यहाँ जान पाए साच्चिकै लाइफ बन्छर ? के त्यहाँ पैसा फल्नि बोट हुन्छर ? यस्तै सोचाइले मन सधै भारि हुन्थियो । म पनि राम्रो मान्छे बन्थे होला त्यहाँ गयता। गाउँ परिबार को हाइ हाइ बनिन्थ्यो होला,गाउँले दाजु भाइ परदेशबाट आउदाँको छाँटकाँट,, फु गरेपनि ठल्नि जस्ता मान्छे,हेर्दा नचिनिनि भएर आउदाँ,अनि सोच्थे एक पटक मात्रै जान पाए भन्नि सोचाइ लिएर एक सुनौलो सपना बोकि यो जिबनको अनौठो  यात्रा गर्न पनि बेर लागेनछ।
यो जिबनले पनि कहिले कोल्टो फेरेछ खै थाहै भएन,गरिबि जिबनलाइ उकास्ने सुरमा अचानक परदेशि जिबन जिउँदा पो थाहा पाए। संसार को लिला के हो भन्नि,बास्तबिकताको दुनिया कस्तो रैछ भन्नि । हो सपनाको परदेश र बिपनाको परदेश एकदम भिन्न लाग्यो मलाइ जो मैले सोच्ने गर्थे, अनि राम्रा राम्रा सपना बुन्ने गर्थे उ बेला । बुढा हजुरबुबाआमा हरु भन्नु हुन्थो" कित परेकाले जान्दछन कित पढेकाले"" साच्चैनै यो शब्दले मेरो मनको एक छेउ लिएको छ अनि यस्तै यस्तै कुरा मनभरि खेलाउदै जिबन जिउन बाध्य भैरहेको छु यो टन्टालापुरे घाम को अनि यो मरुभुमिको तातो हावामा ।।
बिपनाको परदेशको कुरा गर्नु पर्दा मत यो दुनियालाइ बेग्लै ठान्दछु,यहाँ त बाउ खाँदो रैछ पेट भरि छोरो हेर्छ भोकले बाउले खाँको टुलुटुलु, अनि छोरो खादाँ बाउले हेर्नुपर्ने टुलुटुलु ,कति अजिव जस्तो छ यहाको दुनिया ।
कोहि कसैको कुरो सुन्ने फुर्सदनै हुदैन।सबै आफ्नो आफ्नो धुनमा,,छोरो मरेको पनि थाहा छैन बाउ बिमार भको पनि थाह छैन ,एकसुरे जस्तो जिवन रैछ, मलाइ त कता कता लाग्छ,जस्तो सुकै दु:ख कष्ट भएपनि आफ्नै गाँऊ ठाँउनै ठिक। जे भएपनि आफ्नै गाँउमा माया र ममता प्रशस्त छ जस्तो लाग्छ ।।

गाँउ घरकाले सोच्दा होलान,ल फलानाको छोरो कमाउनि भो,के सम्झिन्थ्यो । पैसा को पछाडि लागेपछि के आफ्ना के पराइ सबै तोड्दा रैछन भन्दा होलान। आफु नमरि स्बर्ग देखिदैन भन्छन ति घरमै बसेका बुबाआमा हरुलाइ के थाहा,परदेशको हालत,यहाको परिपाटि ।। हो उनि हरुको सोचाइ पनि म गलत सोच्दिन ठिक  हो ,तर गाउँ परिबार आफ्नाको सम्झना त किन हुदैनर सम्झना मनमै खुम्चाएर राखनु पर्दो रैछ यहाँ,माया ममतालाइ भूल्नु पर्दो रैछ यहाँ काम नगरि सुखै नहुनि ,भो आज स्वास्थ्यलाइ ठिक छैन भोलि गरमला काम भन्न नपाइनि, जति दु:ख भएपनि मरिमेट्नै पर्नि उफ यो कस्तो दुनिया हो ?
बिरामि पर्दा तातो पानि पनि तताएर दिनि मान्छे नहुदाँ मन त यति त रुदैन, सकि नसकि आफुले नै गर्न पर्ने ।
आफुले नबाले चुलो बल्दैन । ला आज तलाइ सन्चो छैन म बनाइ दिन्छु खाना त सुत भन्नि मान्छे त कहाँ हो कहाँ ओइ कस्तो छ भनेर बोलाउने मान्छे समेत हुदैनन् । अनि यहि देशका मान्छेको परदेशिहरुलाइ हेर्नि नजर पनि अलग हुदो रैछ , को हो को हो जस्तो गर्नि,जति लडारिएर मडारिएर बसेपनि यहाँका मान्छे सँग परदेशि परदेशि नै हुदो रैछ, आखिर एक्लो ।
दुइ पैसा कमाइ केहि गरौला भन्नि सोच पनि परदेश को हाबाले त्यतिकै उडाइदिदो रैछ। बुढेसकालको साहरा होलान छोराछोरि भन्दा बाउआमा सँगै चाहरा माग्नि अबस्थामा भको म परदेशि लाइ देख्दछु।
हरपल गाँउ परिबार को यादले मन छटपटाइरहदा कति खेर जाम जस्तो हुनि यो मन,,सधै सधै यो उडेर गाउकै सपना मा बिलिन हुन्छ।। बाआमा कस्तो हुनुहुन्छ होला? काका काकि को के खबर छ होला ? पल्लाघरे दाइभाइ,उपल्लो घरकि हजुरआमा ,,बहिनिहरु,,कस्ता होलान के गर्दै होला ? फलानो के गर्दै होला फलानि के गर्दै होलि ? गाँउमा नयाछ के हुदै छ होला ? यस्तै यस्तै कुराहरु यँहाका दिन काट्ने साथिहरु हुदा रैछन। मन किन हो किन एकोहोरिरहन्छ । जे भएपनि काम त गर्नै पर्ने । काम नगरि खान कहाँ पाइन्छर ।जे पर्दा पनि लदिन पर्छ यहाँ।। उफ कहिले काहि त मनमा गाँठो परेर आउछ यहाको चलन देख्दा,, धेरै चोटि रोएको पनि थिए बाबुआमाको यादमा तर रोएको पनि सुनिदिने कस्ले आँखाको आँशु आँखैमा सुकाउनु पर्ने। आमा भनेर बोलाउन मन लाग्दा बोलाउन पाइएन ।यहाँ।
जस्तै भएपनि परिबारको काखमा रामाउन कसलाइ मन छैनर,यो दुनिया स्बार्थि भनौ कि के भनौ, जे गरे पनि राम्रो हुदैनहुने।बाध्यता त मजबुरिले गर्दा बिरानो मुलुकतिर पाइला नचालि नहुने, उहि पैसा को कारण सबैथोक त्यागि पराइ घर सिघार्न पर्ने,किन हो किन यो दुनियाले पैसालाइ नै ठुलो देखेको होला सोच्छु तर के गर्ने जता जाउ त्यहि उइ पैसा यो बिना त केहि गर्छु भन्दा पनि नसकिने कस्तो जमना होला यो सोच्दा सोच्दै मान्छेलाइ पागल बनाइदिन्छ ।

मलाइ त यस्तो लाग्दै छ, जस्तो सुकै होस जति दु:ख गर्न परेपनि आफनै गाउलाइ सिघार्नि मन छ तर मन भएर के गर्नि धनलाइ अगाडि नलगिन्जेल सम्म केहि नहुनि उफ ,एक मन त भो मत जान्छु परदेश भन्नि यस्तै रैछ भन्नि सोच्छु फेरि एकछिन पछि मन बदलिन्छ भो जानु हुदैन, घर गएर पनि  केहि गर्न सकिएन भने मेरो एक्लो जिबन त जहा गएर भए पनि पालुला तर घर परिबार पनि हेर्न पर्यो नि भन्नि सोचाइले खिचेर फेरि यहिको दुनियामा रमाउने कोसिस गर्ने सोच्छु तर मनले मान्दैन ।
मत सबै मेरा साथिभाइलाइ यो भन्न चाहन्छुकि ढिडो रोटो जस्तो भएपनि घरकै खाउ,दु:ख जति परेपनि परिबार सँगै बाड्दै जिउ तर परदेश जानि दुइ पैसा कमाउनि सोचाइ लाइ बदलौ मान्छेको जातलाइ जति भएपनि थोरैनै हुन्छ त्यसैले संतोष ,धैर्य लाइ कहिल्यै नतोडम भन्छु म त ।बरु भगवान सँग प्रार्थाना गरौ कि भगबान अहिले जस्तो जिइ रहेको छू उस्तै सँधै भइरहोस यहाँ भन्दा तलनि जान नपरोस र यहाँ भन्दानि माथि पनि नलगिदेउ भनौ यो लोभको घैटोमा जति पानि हालेपनि भरिदैन ।
बरु आफ्नै गाँउमै केहि गरेर देखाउनि सोचाइ बनाम तर पैसाको आशमा परदेशलाइ नरोजम ।।बस साथि ।बस
यहि हो यो म मात्रै होइन सबै परदेशिको बेथा ,परदेशिको बेथा ।


Lamahi dang

मलाई त सुनसान रातसँग डर लाग्छ

मलाई त सुनसान रातसँग डर लाग्छ
हावै नचली हल्लिने पातसँग डर लाग्छ
अंग आफ़्नै शरिरमा जोडिएका भए पनि
वाह्य इशारामा चल्ने हातसँग डर लाग्छ
धेरै कथा जिन्दगीका बियोगान्त हुन थाले
अन्त्यभन्दा अचेल शुरुवातसँग डर लाग्छ

Lamahi dang

तिम्रो त्यो झुठो मायाले
सपनाको भारी बोकाई
बिपनामा छाडी गयौ
आज म जिउँदो छदाछदैं
अर्काकै तिमी भयौ
नहुनुनै थियो भने
ब्यर्थै किन माया लायौ?
तिम्रो त्यो झुठो मायाले
आज मलाई जिउँदै मार्यौ
हजार कसम नखाँुउ भन्थे
खान मलाई वाध्य पार्यौ
आज यही बिष भयो
मलाई आज जिउँदै मार्यौ
सुख तिम्रो संसार थियो
यो दुखिलाई किन हेर्यौ?
आखिर तिम्रो जीत भयो
किन यात्राो नाटक खेलेउ??

Lamahi dang

सक्छस भने भाबी तैले पुन भाग्य लेख्दे..
जिबन रहेछ लामो यात्रा ,धेरै हिंड्नु पर्ने
पाइलै पिक्छे काडा बिज्छ ,खै कसरी हिंड्ने
भाबी तेरो के बिगारी , गल्ती के थ्यो मेरो ?
कन्जुस किन गरिस तैले ,भाग्य लेख्दा मेरो ?
मेरो जस्तो जिबन तेरो ,भयदेखी रुन्थिस ?
जिबन जिउन कती गाह्रो हुन्छ भन्ने बुज्थिस ?
मसी नभय रगत दिन्छु ,रगतैले लेख्दे..
सक्छस भने भाबी तैले पुन भाग्य लेख्दे..

Lamahi Dang

हाम्ो रमाईलो थाऊ दाँड•देवखुरी ।
हेरदा लागछ रमाईलो ।